सई रा नरसिम्हा रेड्डी मूवी रिव्यू

सई रा नरसिम्हा रेड्डी मूवी रिव्यू
कलाकारअमिताभ बच्चन,चिरंजीवी,नयनतारा,सुदीप किच्चा,तमन्ना भाटिया,रवि किशनअवधि2 घंटा 47 मिनट
बाहुबली’ की अभूतपूर्व सफलता ने दक्षिण के फिल्मकारों को अपनी लैविश बजट वाली फिल्मों को तमिल-तेलुगु के अलावा हिंदी दर्शकों के सामने परोसने को प्रेरित किया है। ‘साहो’ के बाद निर्देशक सुरेंद्र रेड्डी की ‘सई रा नरसिम्हा रेड्डी’ भी इसी परम्परा का निर्वाह करती नजर आती है।
फिल्मकारों ने अद्भुत सेट्स, सांसों को थमा देनेवाला अविश्वसनीय ऐक्शन और चिरंजीवी, बिग बी और सुदीप किच्चा जैसे मेगा स्टार्स की मौजूदगी से हिंदी दर्शकों को लुभाने की पूरी कोशिश की है

फिल्म की कहानी इतिहास की सच्ची घटना पर आधारित है। 1857 के राष्ट्रीय आंदोलन से दस साल पहले नरसिम्हा रेड्डी (चिरंजीवी) ने ईस्ट इंडिया कंपनी अर्थात अंग्रेजों के अतिक्रमण के खिलाफ बगावत का बिगुल बजाया था। उय्यलवाडा का पालेदार नरसिम्हा रेड्डी अपनी प्रजा और धरती की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तत्पर रहता है। वह अपने गुरूजी (अमिताभ बच्चन) के दिखाए हुए रास्ते पर चलनेवाला शूरवीर है। वह राज्य नर्तकी लक्ष्मी (तमन्ना) से प्रेम कर बैठता है और उसे अपनी बनाने का वचन भी देता है, मगर तब तक उसे पता नहीं होता कि उसका विवाह अकाल पीड़ित लोगों के उद्धार के लिए बचपन में ही सिद्धम्मा (नयनतारा) से कर दिया गया था। अब एक बार फिर सूखा पड़ने पर गुरूजी की आज्ञानुसार उसे अपनी पत्नी के साथ बैठकर यज्ञ संपन्न करना है ताकि बारिश हो सके। ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों और गलत तरीके से लगान वसूल करने की नीतियों से क्रोधित होकर वह गोरे अधिकारियों को लगान देने से मना कर देता है। गोरों को नरसिम्हा की यह बगावत एक आंख नहीं भाती। वे उसकी प्रजा पर हर तरह का जुल्म ढाते हैं, मगर नरसिम्हा की बगावत जल्द ही क्रांति का रूप धर लेती है और फिर देश को अंग्रेजों के खिलाफ एक सामूहिक आंदोलन में बांध देती है। उसके इस आंदोलन में अवकु राजू (सुदीप किच्चा) और राजा पांडी (विजय सेतुपति) जैसे साथी हैं, तो रवि किशन जैसे विरोधी भी। नरसिम्हा रेड्डी द्वारा फैलाई गई क्रांति की ज्वाला आगे चलकर एक बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम का रूप लेती है, जो 1857 के राष्ट्रीय आंदोलन के तौर पर में सबके सामने आया था।
फिल्म की कहानी इतिहास के उस पन्ने से ली गई है, जब नरसिम्हा ने गोरों के विरुद्ध पहली बार विद्रोह का नारा बुलंद किया था। फिल्म देशभक्ति से ओत-प्रोत होने के कारण निर्देशक ने भक्तिरस को दर्शाने के लिए उसे कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाया है, मगर सेट्स और ऐक्शन के मामले में वे कहीं भी उन्नीस साबित नहीं हुए हैं।

1857 के दौर को दर्शाने में निर्देशक ने जिन भव्य सेट्स का इस्तेमाल किया है, वे अपने आप में काबिले तारीफ हैं। ग्रेग पॉल, ली विटाकर, राम-लक्ष्मण और ए विजय के स्टंट्स देखते हुए आपकी आंखें चौड़ी हुए बिना नहीं रह पाती। 2 घंटा 50 मिनट की लंबाई खलती है। फिल्म अगर 20-25 मिनट कम होती तो ज्यादा क्रिस्प और दिलचस्प लगती। स्क्रीनप्ले और फिल्म की लिखावट को बेहतर किया जा सकता था। फिल्म का क्लाईमैक्स और प्री-क्लाईमैक्स देशभक्ति वाला होने के बावजूद खिंचा हुआ लगता है। संगीत औसत है। अभिनय के मामले में दक्षिण के मेगा स्टार चिरंजीवी पर्दे पर अपने चार्म के साथ प्रस्तुत हुए हैं। ऐक्शन के अविश्वसनीय दृश्यों को उन्होंने अपने बॉडी लैंग्वेज से जस्टिफाई किया है। सुदीप किच्चा अपने रोल में याद रह जाते हैं। तमन्ना फिल्म के शुरुआती दृश्यों के बाद गायब हो जाती हैं और फिल्म के आखिर में नजर आती हैं। वे खूबसूरत लगी हैं। आग की आहुतिवाला उनका नृत्य यादगार बन पड़ा है। नयनतारा ने अपनी भूमिका को न्याय दिया है। गुरूजी के रूप में बिग बी प्रभावशाली रहे हैं, मगर फिल्म में उनका रोल सीमित है। सहयोगी कास्ट ठीक-ठाक रही है। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और हिंदी में बनी इस फिल्म का बजट 250 करोड़ बताया जा रहा है।

क्यों देखें-चिरंजीवी और दक्षिण की भव्य बजटवाली फिल्मों के शौकीन यह फिल्म देख सकते हैं।

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